Govt. of Chhattisgarh Protected Monuments Centrally Protected Monuments/Sites Raipur Circle, Raipur Rock Art Sites in Chhattisgarh Megalithic Monuments in Chhattisgarh Chemical Conservation Gram Dharohar Samiti Excavation Survey
Importance What is Archive Preservation Conservation Records in CG
Raipur Museum Bilaspur Museum Jagdalpur Museum
2007 - 2008 2008 - 2009 2009 - 2010 2010 - 2011
11th Finance 12th Finance Grants Pensions Kalakar Kalyan Kosh
Sankalp Anupalan 1878 Act 1958 Act 1959 Act 1959 Rule 1964 M.P. Act 1970 M.P. Act 1972 M.P. Act 1973 M.P. Act Ministry of Education 1975 M.P. Act Rajbhasha Act Chhattisgarhi Rajbhasha Ayog
Rajnandgaon Korba Korea Kanker Sarguja Mahasamund Durg Raigarh Ambikapur Janjgir-Champa Raipur
Manual Effective Execution
Purkhouti Muktangan Multicultural complex Chhattisgarhi Rajbhasha Ayog Vivekanand Prabuddh Sansthan Padumlal Punnalal Bakshi Shrijanpeeth, Bhilai Chhattisgarhi Sindhi Sahitya Sansthan, Raipur Mahant Sarveshwardas Granthalay
ARCHAEOLOGY   ::   ARCHIVE   ::   MUSEUM   ::   PRATIVEDAN   ::   SCHEMES   ::   ACT   ::   PUBLICATION   ::   SAMMAN   ::   RIGHT TO INFORMATION   ::   TENDER

Content on this page requires a newer version of Adobe Flash Player.

Get Adobe Flash player

HOME  ::   JILA PURATATVA SANGH  ::   UNITS UNDER DEP.  ::   ARTIST REGISTRATION  ::   EVENTS  ::   PHOTO GALLERY  ::   CONTACT US  ::   GUESTBOOK
Other Links
छत्तीसगढ़ के वाद्य यंत्र
  1. ढोल
    इसका खोल लकड़ी का होता है । इस पर बकरे का चमड़ा मढ़ा जाता है एवं लोहे की पतली कड़ियां लगी रहती है । जिसे चुटका कहते है । चमड़े अथवा सूत की रस्सी के द्वारा इसको खींचकर कसा जाता है । फाग तथा शैला नृत्यों में इनका विशेष उपयोग होते हैं ।

  2. नगाड़ा
    आदिवासी क्षेत्र में इसे यमार या ढोलकिया लोग उत्सवों के अवसर पर बजाते हैं, छत्तीसगढ़ में फाग गीतों में इसका विशेष प्रयोग होते हैं । नगाड़ों में जोड़े अलग-अलग होते हैं । जिसमें एकाकी आवाज पतली (टीन) तथा दूसरे की आवाज मोटी (गद्द) होती है । जिसे लकड़ी की डंडीयों से पीटकर बजाये जाते हैं । जिसे बठेना कहते हैं । इसमें नीचे पकी हुई मिट्टी का बना होता है ।

  3. अलगोजा
    तीन या चार छिद्रों वाली बांस से बनी बांसुरी को अलगोजा या मुरली कहते हैं, अलगोजा प्रायः दो होते हैं, जिसे साथ मुंह में दबाकर फूंक कर बजाते हैं । दोनों एक दूसरे के पूरक होते हैं । जानवरों को चराते समय या मेलों मड़ाई के अवसर पर बजाते हैं ।

  4. खंजरी या खंझेरी
    डफली के घेरे में तीन या चार जोड़ी झांझ लगे हो तो यह डफली या खंझेरी का रुप ले लेता है, जिसका वादन चांग की तरह हाथ की थाप से किया जाता है ।

  5. चांग या डफ
    चार अंगुल चौड़े लकड़ी के घेरे पर मढ़ा हुआ चक्राकार वाद्य सोलह से बीस अंगूल का व्यास होते हैं जिसे तारों हाथ के थाप से बजाया जाता है, इसके छोटे स्वरुप को डफली कहते हैं, और बड़े स्वरुप को कहते हैं ।

  6. ढोलक
    यह ढोल की भांति छोटे आकार की होती है । लकड़ी के खोल में दोनो तरफ चमड़ा मढ़ा होता है, एक तरफ पतली आवास और दूसरे तरफ मोटी आवाज होती है, मोटी आवाज तरफ खखन लगा रहता है, भजन, जसगीत, पंडवानी, भरथरी, फाग आदि इसका प्रयोग होता है ।

  7. ताशा
    मिट्टी की पकी हुई कटोरी (परई) नुमा एक आकार होता है, जिस पर बकरे का चमड़ा मढ़ा होता है, जिसे बांस की पतली डंडी से बजाया जाता है, छत्तीसगढ़ में फाग गीत गाते समय नगाड़े के साथ इसका प्रयोग होता है ।


  8. बांसुरी
    यह बहुत ही प्रचलित वाद्य है, यह पोले होते हैं । जिसे छत्तीसगढ़ में रावत जाति के लोग इसका मुख्य रुप से वादन करते हैं, पंडवानी, भरथरी में भी इसका प्रयोग होता है ।

  9. करताल, खड़ताल या कठताल
    लकड़ी के बने हुए 11(ग्यारह) अंगूल लंबे गोल डंडों को करताल कहते हैं, जिसके दो टुकड़े होते हैं, दोनों टुकड़ो को हाथ में ढीले पकड़कर बजाया जाता है, तमूरा, भजन, पंडवानी गायन में मुख्यतः इसका प्रयोग होता है ।

  10. झांझ
    झांझ प्रायः लोहे का बना होता है, लोहे के दो गोल टुकड़े जिसके मध्य में एक छेद होता है, जिस पर रस्सी या कपड़ा जिस पर रस्सी या कपड़ा हाथ में पकड़ने के लिए लगाया जाता है । दोनों एक-एक टुकड़े को एक-एक हाथ में पकड़कर बजाया जाता है ।

  11. मंजीरा
    झांझ का छोटा स्वरुप मंजीरा कहलाता है । मंजीरा धातु के गोल टुकड़े से बना होता है, भजन गायन, जसगीत, फाग गीत आदि में प्रयोग होता है ।


  12. मोंहरी
    यह बांसुरी के समान बांस के टुकड़ों का बना होता है । इसमें छः छेद होते हैं । इसके अंतिम सीरे में पीतल का कटोरीनुमा..... लगा होता है । एवं इसे ताड़ के पत्ते के सहारे बजाया जाता है । मुख्यतः गंड़वा बाजा के साथ इसका उपयोग होता है ।

  13. दफड़ा
    यह चांग की तरह होता है । लकड़ी के गोलाकार व्यास में चमड़ा मढ़ा जाता है एवं लकड़ी के एक सीरे पर छेद कर दिया जाता है जिस पर रस्सी बांधकर वावदक अपने कंधे पर लटकाता है, जिसे बठेना के सहारे बजाया जाता है, इसे बठेना पतला तथा दूसरा बठेना मोटा होता है ।

  14. निशान या गुदुंम या सिंग बाजा
    यह गड़वा बाजा साज का प्रमुख वाद्य है । लोहे के कढ़ाईनुमा आकार में चमड़ा मढ़ा जाता है । चमड़ा मोटा होता है एवं चमड़े को रस्सी से ही खींचकर कसा जाता है । लोहे के बर्तन में आखरी सिरे पर छेद होता है, जिस पर बीच-बीच में अंडी तेल डाला जाता है एवं छेद को कपड़े से बंद कर दिया जाता है । ऊपर भाग में खखन तथा चीट लगाया जाता है । टायर के टुकड़ों का बठेना बनाया जाता है, जिसे पिट-पिट कर बजाया जाता है इसके बजाने वाले को निशनहा कहते हैं । गुदुम या निशान पर बारह सींगा जानवर का सींग भी लगा दिया जाता है इस प्रकार आदिवासी क्षेत्रों में इसे सिंग बाजा कहते हैं ।
  Copyright © all rights reserved cgculture.in    Design by : SHUBH INFOTECH, RAIPUR