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पुरातत्वीय उत्खनन
वर्ष
2008-09 हेतु विभाग को भारत सरकार से तीन
स्थलों के उत्खनन हेतु अनुमति प्राप्त हुई है, जिसके अनुसार पचराही,
जिला कबीरधाम, महेशपुर, जिला सरगुजा एवं सिरपुर, जिला महासमुंद में
उत्खनन का कार्य प्रारंभ कर दिया गया है।
सिरपुर उत्खनन से 79 कांस्य प्रतिमाएं, सिरपुर के सोमवंशी शासक तीवरदेव
का 1 एवं महाद्गिवगुप्त बालार्जुन के 3 ताम्रपत्र सेट प्राप्त हुए
हैं। अब तक सिरपुर में 32 प्राचीन टीलों पर प्राचीन संरचनाएं उत्खनन
से प्रकाश में आए हैं। उत्खनन में पहली बार सिरपुर में मौर्य कालीन
बौद्ध स्तूप प्राप्त हुआ है। उत्खनन के साथ-साथ अनावृत्त संरचनाओं
पर अनुरक्षण कार्य भी करवाया जा रहा है। सिरपुर में अनुरक्षण एवं विकास
के कार्य कराए जा रहे हैं।
पचराही उत्खनन से प्राचीन मुद्राएं, पाषाण प्रतिमाएं एवं प्राचीन
मंदिरों के भग्नावशेष प्रकाश में आये हैं। उत्खनन के दौरान प्रागैतिहासिक
काल, कल्चुरी काल, फणिनागवंद्गा तथा मुगल काल के प्रमुख अवशेष प्राप्त
हुए हैं। इस उत्खनन में छत्तीसगढ़ में पहली बार कवर्धा के फणी नागवंद्गा
का 1 स्वर्ण एवं 3 रजत मुद्रा प्रकाश में आए हैं, जिससे छत्तीसगढ़ के
राजनैतिक इतिहास को एक नई दिशा मिली है। इसके अतिरिक्त कल्चुरि राजा
जाजल्यदेव तथा मुगलकालीन 12 ताम्र मुद्राएं प्रकाश में आई है। उत्खनन
से ज्ञात होता है कि पचराही प्रागैतिहासिक काल से लेकर मुगल काल तक
सतत् रूप से मानव जाति का विचरण स्थली रहा है। मुखयमंत्रीजी ने विशेष
रूचि लेकर पचराही प्रवास के दौरान उत्खनन कार्य के संदर्भ में विभाग
के प्रयासों और उपलब्धियों को रेखांकित कराया है।
महेशपुर उत्खनन से लगभग 7वीं सदी ईसवीं के सोमवंशी कला शैली के ईंटों
से निर्मित ताराकृति तल योजना युक्त शिव मंदिर की संरचना ज्ञात हुई
है। दक्षिण कोसल के सोमवंशी कला द्गौली के ताराकृति तलयोजना युक्त
मंदिरों में यह विशाल है। परिसर में अन्य 4 लघु शिवमंदिर भी अनावृत्त
किये गए हैं। यहां से प्रमुख रूप से स्थापत्य खंड, कृष्ण कथा तथा अन्य
प्रतिमाओं के कलात्मक शिल्प प्रकाश में आए हैं। भग्न अभिलेख का एक
अंद्गा भी प्राप्त हुआ है। प्राप्त अवशेषों में ब्रिटिश कालीन 33 ताम्र
मुद्राएं भी सम्मिलित हैं।
बिलासपुर जिले में शिवनाथ नदी के मध्य स्थित मदकूदीप में उत्खनन कार्य
तथा रायपुर जिले में खारून नदी के किनारे तरीघाट के टीलों में पुरातत्वीय
तकनीकी सर्वेक्षण कार्य हेतु अनुमति प्राप्त हो गई है। इन कार्यों
से राज्य की पुरातत्वीय संपदा और प्राचीन इतिहास के क्षेत्र में महत्वपूर्ण
उपलब्धियों की प्रबल संभावना है।
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